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हिन्दी दिवस पर विशेष लेख - "हिन्दी : हमारी पहचान, हमारी शान"

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  हिन्दी  दिवस पर विशेष लेख      "हिन्दी : हमारी पहचान, हमारी शान"   हर वर्ष 14 सितंबर को  हिन्दी  दिवस  मनाया जाता है। यह दिन न केवल भाषा के रूप में हिन्दी के महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जड़ों और राष्ट्रीय एकता को भी मज़बूती प्रदान करता है। हिन्दी दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन का दिन है—क्या हम वास्तव में अपनी मातृभाषा के साथ न्याय कर पा रहे हैं? 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को  भारत की राजभाषा  के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद, 1953 से हर वर्ष...

तर्पण कॉलम के लिए लेख

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  मेरे दादा जी स्व. चौधरी मनफूल सिंह मोर (वकील) मेरे जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा रहे हैं। उनका अनुशासन, परिश्रम और नेकदिल स्वभाव हमेशा मुझे सही राह दिखाते हैं। वे हर मुश्किल समय में धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखने की सीख देते थे। दादा जी कहा करते थे कि सच्चाई, ईमानदारी और शिक्षा से ही जीवन में सम्मान और सफलता मिलती है। उनके विचार आज भी हमारे साथ हैं और हमारा परिवार हर कदम पर उन्हीं के बताए रास्ते पर चलने का प्रयास करता है। उनका प्रेम, स्नेह और मार्गदर्शन हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है, जो हमें आगे बढ़ने की शक्ति देता है। - जगदीप सिंह मोर, सेक्टर 65 निवासी  

शिक्षक दिवस पर एक प्रतिबिंब — सम्मान, असमानता और न्याय की चाह

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  शिक्षक दिवस पर एक प्रतिबिंब — सम्मान, असमानता और न्याय की चाह 5 सितंबर, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती को शिक्षक दिवस के रूप में मनाना हमारे लिए केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि अवसर है यह सोचने का कि क्या वास्तव में हम अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान और उनके अधिकारों के प्रति संवेदनशील हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कई आदेश दिए हैं जो हमारी चर्चा को और सशक्त बनाते हैं: उत्तर प्रदेश में इंचार्ज हेडमास्टर्स का वेतन: सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त 2025 को आदेश दिया कि जो शिक्षक प्रधानाध्यापक का कार्यकाल निभाते हैं, उन्हें उसी वेतन और बकाया राशि का भुगतान किया जाए। इससे लगभग 50,000 शिक्षकों को लाभ मिलेगा और उनके वर्षों पुराने बकाया का निदान होगा। बिहार के संबद्ध डिग्री कॉलेजों के शिक्षकों की सुरक्षा : 31 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि 19 अप्रैल 2007 से पहले नियुक्त शिक्षकों को वेतन और पेंशन मिलना चाहिए—बिना किसी और देरी के। संविदा शिक्षकों की समानता : न्यायालय ने यह जोर देकर कहा कि संविदा शिक्षकों को भी न्यूनतम स्वीकार्य वेतन मान मिलना चाहिए, क्योंकि वे नियमित शिक्षकों...

ऑपरेशन सिंदूर : कितनी शक्ति, कितनी दुर्बलता / (Analysis of our Strength and Weakness)

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  ऑपरेशन सिंदूर : कितनी शक्ति,  कितनी दुर्बलता   पहलगाँव नरसंहार आजाद भारत में  हुए आतंकवादी हमलों में सबसे  बर्बर माना जाएगा, तत्पश्चात भारत  सरकार ने इसका बदला लेने के  लिए ऑपरेशन सिंदूर लागू किया।  भारत ने पाकिस्तान में पल रहे  आतंकवादियों के ठिकानों को निशा ना बनाया।क्यूँकि पाकिस्तानी  सरकार एवं सैन्य बल, आतंकवाद का पालन-पोषण करते  हैं इसलिए जल्द ही वहाँ की सेना  ने भारत के खिलाफ जवाबी कार् यवाही शुरू कर दी। इसका भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया और दुश्मन  के मंसूबों पर पानी फेर दिया।    ऑपरेशन सिंदूर अपने अंदर अनेकों  राज छुपाए बैठा है, जो...

क्या व्यावहारिक हैं इतने बड़े आयोजन?

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  इस लेख का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति/वर्ग की धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देना कदापि नहीं है, वरन परिस्थितियों को प्रशासनिक एवं व्यावहारिक नजरिए से देखने हेतु है।  महाकुंभ 2025 वर्तमान कालखंड का ध्रुव तारा बना हुआ है। धरती के एक छोटे से भूखंड पर एक समय में इतने मनुष्यों का एक साथ जमावड़ा अपने आप में असाधारण है। इतने बड़े मेले का आयोजन अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इसकी तैयारियों में असंख्य लोगों का परिश्रम, अगणित घंटों का पुरुषार्थ शामिल है। उत्तर प्रदेश सरकार एवं मेला प्रशासन इसके लिए प्रशंसा के पात्र हैं। परंतु मौनी अमावस्या की रात्रि पर हुई भगदड़ एवं पुण्यात्माओं की क्षति ने इस महान उत्सव की शान में धब्बा लगा दिया। इसके उपरांत विभिन्न विवेचनाओं का जन्म हुआ और छींटा-कशी का दौर भी प्रारम्भ हुआ। जहां एक ओर मृतकों की संख्या को लेकर असमंजस है वहीं यह भी आरोप है कि सरकार ने क्षति का सटीक अवलोकन आमजन के समक्ष नहीं रखा है। इसी प्रक्षेप में यह दक्ष प्रश्न उठता है कि, क्या हमें इतने बड़े आयोजन करने चाहिए? क्या प्रशासनिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से ऐसे आयोजन सम्भव हैं? आइए एक नज़र महाकुंभ 2...

बचपन बचाओ क़ानून : ऑस्ट्रेलिया से सीखे भारत

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  अपनी संसद में यह कानून पास कर ऑस्ट्रेलिया संसार का पहला देश बना जिसने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। यह निर्णय सम्पूर्ण जगत के लिए ऐतिहासिक है। ऑस्ट्रेलिया के राजनेताओं की दूर दृष्टिता सराहनीय है जिस ने बच्चों के बचपन को बचाने के लिए ऐसा अहम कदम उठाया। इस प्रतिबंध से ना सिर्फ़ बच्चों का बचपन बचा रहेगा अपितु समाज में होने वाले अपराध भी कम होंगे एवं ऑस्ट्रेलिया अपनी संस्कृति को भी सहेज पाएगा। इस कानून के मुताबिक  16  वर्ष से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया ऐप्लिकेशन पर अपना अकाउंट नहीं बना पाएँगे। इस हिसाब से फ़ेस्बुक, इन्स्टग्रैम, एक्स (भूतपूर्व ट्विटर), टिक-टॉक, स्नैपचैट, रेडइट इत्यादि बच्चों की पहुँच से बाहर हो जाएँगी। विशेष बात यह है कि इस कानून में बच्चों को नहीं बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों को कटघरे में खड़ा करने का प्रावधान है। इन सोशल मीडिया कंपनियों को अब यह सुनिश्चित करना पड़ेगा की कोई भी  16  वर्ष से कम उम्र का बालक इन वेब्सायट पर अपना अकाउंट नहीं बना सके। अगर यह कंपनियां सुचारू रूप से ऐसा करने में विफल होती हैं तो इनको  33 ...

सूचना और मीडिया एक्सपोजर का तर्कसंगत विश्लेषण

  सूचना और मीडिया एक्सपोजर का तर्कसंगत विश्लेषण आज के डिजिटल युग में मीडिया का प्रभाव हर पहलू में महसूस होता है। चाहे वह समाचार चैनल  हो  सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हो या फिर इंटरनेट पर वायरल होने वाली खबरें , सभी जगह हम लगातार  सूचनाओं से घिरे होते हैं। इन सूचनाओं के माध्यम से हम न केवल दुनिया की घटनाओं से अवगत  होते हैं , बल्कि ये हमारे सोचने और समझने के तरीके को भी प्रभावित करती हैं। खासकर विद्यार्थियों  के लिए , मीडिया और सूचना का सही और तर्कसंगत विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है। भारतीय मीडिया का प्रभाव भारतीय मीडिया का दायरा बहुत विस्तृत है। यहाँ विभिन्न भाषाओं में समाचार चैनल , अखबार , रेडियो  और इंटरनेट आधारित प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं। ये सभी माध्यम समाज में हो रही घटनाओं , राजनीतिक  विचारों , सामाजिक मुद्दों , और यहां तक कि व्यक्तिगत जीवन के बारे में सूचनाएँ प्रदान करते हैं।  हालांकि , भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा कभी-कभी पक्षपाती हो सकता है या सूचनाओं में गड़बड़ी  कर सकता है। इसलिए मीडिया का तर्कसंगत विश्लेषण करना और खबरों की सं...