बच्चे पढ़ने जाते हैं, मरने नहीं
बच्चे पढ़ने जाते हैं, मरने नहीं दिल्ली के सत्यनिकेतन में पांच मंजिला इमारत के ढहने से सात लोगों की मौत ने एक बार फिर देश के सामने वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है—हमारा प्रशासन हादसों के बाद ही क्यों जागता है? यह केवल एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था के ढहने की कहानी है, जिसमें अपने सपनों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली आने वाले छात्र सुरक्षित जीवन की बुनियादी गारंटी तक से वंचित हैं। हादसे के बाद सामने आया कि इमारत में छात्रों के लिए पीजी सुविधा संचालित हो रही थी और वहां निर्माण/बेसमेंट संबंधी काम भी चल रहा था। पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज की है और प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई शुरू हुई है। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? क्या उस इमारत को हादसे से पहले किसी अधिकारी ने देखा था? क्या पीजी के रूप में उसके संचालन की अनुमति थी? क्या उसकी संरचनात्मक मजबूती की जांच हुई थी? क्या वहां रहने वाले छात्रों की संख्या, आपातकालीन निकास, अग्नि सुरक्षा और निर्माण कार्यों की निगरानी की गई थी? यदि नहीं, तो यह केवल भवन मालिक की गलती नहीं, बल्कि उ...