जड़ें
जड़ें
यूँ तो गुरुग्राम एक मिलेनियम सिटी है, परन्तु आज भी यह कई मायनों में नवीन परिपेक्ष में गांवों का समूह ही लगता है, जहाँ रहने वाले तो पूर्वी दुनिया के ग्रामांचल से हैं, परन्तु इंफ्रास्ट्रक्चर पश्चिमी मानकों का हो गया है। यहाँ चमचमाते फ्लैटों में रहने वाले हरियाणा के भीतरी भागों के लोग हैं, जो विभिन्न कारणों से पलायन कर शहर की दुनिया में आ बसे हैं।ऐसे ही एक छोटे कस्बे पवनपुर में जन्म हुआ जय का। यह कस्बा भले ही नक्शे पर एक बिंदु से अधिक न हो, लेकिन जय के जीवन का हर अध्याय यहीं से शुरू होता था। कस्बे की गालियों में मिट्टी की महक, अमरूद के पेड़ों की छांव, और वह पुराना विशाल मकान — सब कुछ उसकी आत्मा में गहराई तक बसा हुआ हो। कस्बा तो छोटा था, मगर वहाँ के लोग बड़े दिलवाले थे। हर गली, हर मोड़ पर कोई न कोई जानने वाला मिल जाता — “अरे, ये तो चौधरी साहब का पोता है”।
उसका मकान कोई आम मकान नहीं था। वकील चौधरी साहब दादा जी ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई से इसे बनवाया था। लाल ईंटों की चौदह इंच की मजबूत दीवारें, शीशम की लकड़ी के ऊंचे दरवाजे, और आंगन में शहतूत का पुराना पेड़ — यह मकान एक इमारत नहीं, बल्कि एक जीती-जागती धरोहर थी। जय के लिए यह मकान उसका संसार था। यहीं उसने अपनी बहन की शादी होते देखी, यहीं उसने पिता की चिता सजते देखी थी।
जय का परिवार कस्बे के सबसे पुराने और सम्मानित परिवारों में गिना जाता था। उनका मकान कस्बे के बीचों-बीच, दिल्ली चौक पर बना एक पुराना, मगर भव्य हवेली जैसा घर था। मिट्टी की खुशबू से भीगे आंगन, सामने घास का बगीचा, जिसमें गुलाबों की कतारें, और किनारे चमेली और कनेर के झूमते पेड़। यहीं जय का बचपन बीता, मिट्टी में खेलते, पौधे लगाते और शिक्षक पिता की लाइब्रेरी में पुस्तकें पढ़ते। उसका घर गली के वाहिद घरों में गिना जाता था जहाँ फलों में शरीफा का पेड़ था और फूलों में हारश्रृंगार का बड़ा दरख़्त था।
उस मकान में जीवन की कई कहानियाँ लिखी गई थीं। दादा-दादी ने उस घर की नींव रखी थी, पिता ने उसमें जीवन डाला था। जय के बचपन की सबसे प्रिय स्मृतियाँ वहीं की थी — दादी की कहानियाँ, आंगन में पतंग उड़ाना और गर्मियों की दोपहरों में शहतूत के पेड़ के नीचे भाई बहन का लुका-छुपी खेलना।
बचपन बीता, जय बड़ा हुआ। पढ़ाई के बाद नौकरी मिल गई। जय अपनी सीमित तनख्वाह से मकान की मरम्मत करवाता, बारिश में टपकती छत ठीक करवाता, दीवारों पर नई पुताई करवाता। बाहर दुकान में बैठा बिजली वाला जिसको जय चाचा कह कर बुलाता कई बार हँसीं में कहता, "क्यों इतना खर्च करते हो इस बूढ़े मकान पर?", जय बस मुसकुरा देता और उत्तर देता — "चाचा!, यह मकान भीष्म पितामह है, जो कभी बूढ़ा नहीं होगा" ।
समय के साथ जय का विवाह भी हुआ — उसी घर में, उसी आंगन में जहां उसकी बहन की विदाई हुई थी। जब उसका बेटा हुआ तो पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बँटीं। आंगन फिर से खिलखिलाहटों से भर गया था। जय के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी — जैसे जीवन का चक्र पूरा हुआ हो।
परिवार अब पहले जैसा नहीं रहा था। संयुक्त परिवार की परिभाषा समय के साथ बदलने लगी थी। चचेरे भाई, जो कभी साथ खेलते थे, अब बात-बात पर उलाहना मार देते, अपना बड़प्पन दिखाना ना भूलते, कभी-कभी अट्टहास कर देते। लेकिन जीवन कभी एक जैसा नहीं रहता। समय की धारा जैसे शांत झील में पत्थर फेंक दे — सब कुछ हिल जाता है।
जय के पिता का निधन हो गया। उस दिन जय ने पहली बार महसूस किया कि घर सिर्फ ईंट और पत्थर नहीं होता, उसमें साँसे होती हैं, भावनाएँ होती हैं। पिता के जाने के बाद परिवार में दरारें आने लगीं। और फिर एक दिन, जैसे बिजली गिर पड़ी।
पिता के बड़े भाई — जो कानूनी रूप से मकान के हिस्सेदार थे ने ऐलान कर दिया, "यह मकान बिकेगा, जिसका जो हिस्सा बनता है, वो मिल जाएगा" “हमें भी अपने बच्चों का भविष्य देखना है”; उनके पुत्र को लंदन में सेटल होना था । ये वो ही हैं जो कभी दम भरते थे कि मैं अपने जीते जी इस घर को कभी नहीं बेचूंगा, आज अपने बच्चों की ज़रूरतों के आगे नतमस्तक हैं। “अपना-अपना हिस्सा बेचने पर अच्छे दाम नहीं मिलेंगे, न ही कोई ख़रीदेगा, पूरा मकान बेचने पर दाम भी अच्छे मिलेंगे और दोनों को फ़ायदा रहेगा।“
जय के जज़्बात उसके अंदर ही उमड़ के रह गए। उसको तर्क दिए गए की, “कुछ नहीं रखा यहाँ गांव खेड़े में, समय की यही मांग है कि बाहर निकलो, अच्छे शहर में अपना भविष्य तलाशो”, वैसे भी "भावनाओं से पेट नहीं भरता।" “देखो मेरा लड़का लंदन चला गया, तुम भी कुछ करो?” व्यंग में कहा, "ये तो ऐसा ही है जैसे चौधरी परिवार का एक लड़का तो ओलंपिक दौड़ रहा है, दूसरा बेचारा टांग के लंगड़ा है।"
फैसला हो चुका था। मकान बिक गया।
जय जानता था, अकेला वह कुछ नहीं कर सकता। पत्नी ने समझाया, “समझदारी इसी में है कि अपने हिस्से का पैसा लेकर अलग हो जाओ। गुरुग्राम में एक फ्लैट ले लेंगे। पिता के जाने के बाद, पत्नी के पिता ही अब जय के अधिपति थे, उन्होंने भी यही कहा की ‘यहीं गुरुग्राम में आ जाओ हमारे पास, कोई भी बात होगी तो हम पांच मिनट की दूरी पर ही हैं।‘
दिल पर पत्थर रखकर जय ने वो फैसला मंजूर किया। सब कुछ समेटा — कपड़े, किताबें, दादी की दी हुई आध्यात्मिक सामग्री, दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें। लेकिन क्या वाकई सब कुछ समेटा गया?
नहीं!
छूट गए अमरूद के पेड़, जो अब फल देने लगे थे। छूट गई गुलाबों की क्यारियाँ, जिनमें सुबह - सुबह ओस की बूंदें चमकती थीं। छूट गया उसका प्यारा कुत्ता ‘प्लूटो’, जिसे फ्लैट के नियमानुसार रखना मना था। प्लूटो को मोहल्ले के एक बुज़ुर्ग को सौंप कर जय की आँखें भर आईं। और सबसे बढ़कर, छूट गया वह अहसास — “घर” होने का।
धीरे-धीरे करीबन दस चक्करों में घर का सामान छोटे ट्रक में लोड कर गुरुग्राम लाया गया। यह ऐसा ही था जैसे एक हमले में शरीर के टुकड़े हो गए हों एवं धीरे-धीरे दस ऑपरेशन कर उनको जोड़ा जा रहा हो। कुछ हिस्से ठीक जुड़ गए हों एवं कुछ घाव जिंदगी भर के लिए लग गए हों। आखिरी का वह दिन उसकी आत्मा पर किसी गहरे घाव की तरह अंकित हो गया।
एक-एक कमरा, एक-एक कोना — सबको उसने हाथ से छू-छूकर अलविदा कहा। "ऐसा लग रहा है जैसे मैं अपने शरीर के ही कुछ टुकड़े इकट्ठा करके, बाकी हिस्से वहीं छोड़ आया हूँ।" - उसने अपनी पत्नी से कहा, जब उन्होंने आखिरी बार दरवाजा बंद किया।
नया शहर बड़ा था, सुविधाएं थीं, लेकिन वह आत्मीयता नहीं थी। वहां सब कुछ व्यवस्थित था, पर दिल से जुड़ा कुछ भी नहीं था। बेटा अब बड़ा हो रहा था, अच्छे स्कूल में पढ़ रहा था, पत्नी ने भी इंटीरियर डिजाइनर की जॉब करनी शुरू कर दी थी। बड़े शहर में रोजगार की कमी नहीं होती। पत्नी को भी अपने आप पर गर्व महसूस होता था, उसने पवनपुर से निकलने को सकारात्मक ही माना। पर जय हर शाम बालकनी में बैठकर पुरानी यादों में खो जाता।
बड़े शहर में जिंदगी अलग थी — फ्लैट में कैद-सी। उसे लगता, “मैं एक ऐसा पेड़ हूं जिसकी पत्तियां तो हरी हैं, वह पेड़ जड़ विहीन है, यह पेड़ हवा में लटका हुआ है, एक ठूँठ की भांति, तनो पर कुछ शाखें हरी हैं, परन्तु खोखला ठूँठ, न मिट्टी है, न स्थिरता।”
जय हर सुबह ऑफिस जाने से पहले बालकनी में खड़ा होता और उस हवेली की यादों में खो जाता। हवा में कभी-कभी उसे चमेली की खुशबू महसूस होती, जैसे घर अभी भी पुकार रहा हो। हारश्रृंगार का वो पेड़ जैसे स्वागत में झुका हुआ हो, मानो शहतूत के फलों की मिठास खुद रात के बोझ तले टपक रही हो। छोटी मधुमखियों का वो छत्ता जो करौंदे के पेड़ में बनाया था, वो कह रहा हो कि तुम बिन गुलशन सूना-सूना है। अंग्रेजी की एक कहावत भी है – ‘यू कैन टेक द बॉय आउट ऑफ़ टाऊन, बट यू कैन नॉट टेक द टाउन आउट ऑफ़ बॉय’।
बेटा अब चार साल का हो गया था। जिज्ञासु और चंचल। हर चीज़ में सवाल! एक शाम बेटे ने पूछा, “पापा, हम कहाँ के रहने वाले हैं? क्या हमारा भी कोई गांव है?” जय चुप हो गया। ये एक मासूम सवाल था, पर जवाब देने में जैसे पूरी आत्मा कांप उठी। क्या कहे वह कि उसका घर अब बिक चुका है? कि जहाँ उसकी जड़ें थीं, वहाँ अब कोई दूसरा रहता है? उसने बेटे की ओर देखा, मुस्कराने की कोशिश की और कहा, “बेटे, अब हम शहर के ही हैं!” बेटे ने सिर हिलाया, पर उसकी आँखों में सवाल अब भी थे।
कुछ साल और बीते। एक दिन बेटे को स्कूल में एक प्रोजेक्ट मिला — ‘मेरा गाँव!’। “ऑल माय फ्रेंड्स आर कॉलिंग देयर ग्रैंड पास् एंड ग्रैंड मॉम्स। दे आर आस्किंग फॉर पिक्स एंड थिंग्स अबाउट विलेज। आई ऍम क्लूलेस अबाउट इट डैड!” सब बच्चों को अपने गाँव की कहानी लानी थी। बेटा फिर आया, “पापा, सबके गाँव हैं। मेरे दोस्त अपने दादी-दादा के खेतों की बातें कर रहे हैं, अपने पैतृक गांव की तस्वीरें ला रहे हैं। क्या हमारे पास है ये सब?” जय की आत्मा फिर काँप गई। उस रात वह देर तक बालकनी में बैठा रहा। यादें बवंडर बनकर सिर में घूम रही थीं।
अगले रविवार उसने एक फैसला लिया — वह बेटे को अपने पुराने कस्बे, पवनपुर ले जाएगा। गाड़ी में बेटे और पत्नी को लेकर वह निकल पड़ा। पवनपुर अब वो पवनपुर नहीं रह गया था जो जय पीछे छोड़ के आया था, अब वह अपने राज्य का 22वां जिला बन चूका था। सड़कें पूरी तरह से गाड़ियों से जाम थी, मुख्य दिल्ली रोड पर एप्पल, क्रोमा, डोमिनोस एवं हल्दीराम के बड़े शोरूम खुल चुके थे। दिल्ली चौक पर जहाँ उसका घर था वहां आलीशान मिनी मॉल खुल चूका था, छः मंजिली इमारत के ऊपर सिनेमा का लोगो दोपहर को ही चमचमा रहा था। उसका क़स्बा अब शहर बन चूका था। मानो यह गुरुग्राम का ही एक एक्सटेंशन सिटी हो।
जय ने अपने भीतर की कड़वाहट को वहीं छोड़ दिया। उसने मन ही मन अपने पुराने पेड़ों, दीवारों और छांव को प्रणाम किया।
वापसी में, रास्ते में बेटे को बताता गया, “यह वो रास्ता है जहां से हम हर साल दशहरे के मेले में जाया करते थे। ये तालाब हमारे घर के पास था। देखो, ये पुराना हनुमान जी का पंचवटी मंदिर, यही तो है जहाँ मैंने पहली बार घंटी बजाई थी।”
पवनपुर से लौटने के बाद कुछ बदल गया था। बेटे ने अपने प्रोजेक्ट में लिखा — “मेरा गांव अब गांव नहीं है, मेरा गांव अब शहर हो गया है, उसकी सड़कें गाड़ियों से भरी हुई हैं, शहर के ऊपर से फ्लाईओवर गुजर रहा है। डैड के इमोशंस उसके साथ जुड़े हुए हैं, डैड शायद आज भी अपना पुराना गांव देखना चाहते हैं बट दैट्स टू इम्प्रेटिकल। चेंज इस इनएविटबल। शायद गाँव सिर्फ वो जगह नहीं होती जहाँ हम रहते हैं, गाँव वो होता है जहाँ हमारी यादें रहती हैं।”
जय ने अपने बेटे की कॉपी पढ़ते हुए महसूस किया कि जड़ें खोई नहीं थीं — वो बस समय की धूल के नीचे दब गई थीं।
अब वह अक्सर बेटे को पेड़-पौधों के बारे में बताता, मिट्टी से जुड़ाव सिखाता, बालकनी में छोटे गमले में चमेली का पौधा लगाया। "मैं फिर से जड़ें बनाऊंगा", उसने मुस्कराते हुए कहा। उसने जाना कि जड़ें मिट्टी में नहीं, यादों में होती हैं। और जब तक यादें ज़िंदा हैं, घर भी ज़िंदा है।
शहर का फ्लैट अब भी “घर” नहीं बन पाया था, पर एक पौधा रोपा जा चुका था। वो पौधा जो एक दिन फिर जड़ें फैलाएगा। शायद अब यही गमला अगली पीढ़ी का मुस्तकबिल है, इस सत्य को स्वीकारना ही व्यव्हारवाद एवं यथार्थवाद है।
क्योंकि घर दीवारों से नहीं बनता, घर बनता है यादों से, रिश्तों से, और उन जड़ों से जिन्हें हम कभी देख नहीं पाते — पर जो हमेशा हमारे भीतर होती हैं।
- जगदीप सिंह मोर
[इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं, इनका किसी भी व्यक्ति (जीवित या मृत), जगह या घटना से कोई सम्बंध नहीं है । यदि किसी व्यक्ति, जगह या घटना से इसकी समानता होती है, तो इसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा ।]


बहुत सुंदर कहानी
ReplyDeleteबहुत धन्यवाद 🙏
Deleteयह कहानी बहुत सुंदर और दिल को छूने वाली है। जय के लिए यह बहुत मुश्किल रहा होगा।
ReplyDeleteबहुत धन्यवाद 🙏
Deleteयह कहानी बेहद सुंदर, भावनात्मक और दिल को छू लेने वाली है। कहीं न कहीं यह हम सभी से जुड़ी हुई प्रतीत होती है। आज के इस आधुनिक दौर में, बेहतर भविष्य और मजबूरियों के चलते हम अक्सर अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपने मूल संस्कारों से दूर होते चले जाते हैं।
ReplyDeleteयह कहानी हमें याद दिलाती है कि कितनी भी ऊँचाइयाँ क्यों न छू लें, हमारी पहचान हमेशा हमारी जड़ों से ही जुड़ी रहती है। आधुनिकता की दौड़ में अगर हम अपनी मूल भावनाओं और रिश्तों को भूल जाएँ, तो कहीं न कहीं हम खुद से ही दूर हो जाते हैं।
यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक एहसास है—जो हर उस इंसान के दिल को छू जाती है, जिसने कभी अपने घर, अपने गाँव या अपने बचपन को पीछे छोड़ा है।
बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी
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