Posts

Showing posts from 2026

हिन्दी : केवल भाषा नहीं, हमारी पहचान का स्वर

Image
 हिन्दी : केवल भाषा नहीं, हमारी पहचान का स्वर भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज की स्मृतियों, संस्कारों, संवेदनाओं और सांस्कृतिक पहचान की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति होती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में हिन्दी का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि यह देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों को जोड़ने वाली प्रमुख भाषाओं में से एक है। प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाने वाला हिन्दी दिवस हमें अपनी भाषा के प्रति गौरव और उसके प्रति अपने दायित्व की याद दिलाता है। हिन्दी की वैश्विक पहुंच का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2026 के एथनोलॉग के आंकड़ों के अनुसार हिन्दी को पहली या दूसरी भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या लगभग 61.1 करोड़ है, इनमें करीब 34.7 करोड़ मातृभाषी और 26.4 करोड़ दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी बोलने वाले शामिल हैं। इस आधार पर हिन्दी दुनिया की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर है। भारत के अतिरिक्त फिजी में हिन्दी को आधिकारिक दर्जा प्राप्त है और मॉरीशस, नेपाल, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, त...

बच्चे पढ़ने जाते हैं, मरने नहीं

Image
  बच्चे पढ़ने जाते हैं, मरने नहीं दिल्ली के सत्यनिकेतन में पांच मंजिला इमारत के ढहने से सात लोगों की मौत ने एक बार फिर देश के सामने वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है—हमारा प्रशासन हादसों के बाद ही क्यों जागता है? यह केवल एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था के ढहने की कहानी है, जिसमें अपने सपनों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली आने वाले छात्र सुरक्षित जीवन की बुनियादी गारंटी तक से वंचित हैं। हादसे के बाद सामने आया कि इमारत में छात्रों के लिए पीजी सुविधा संचालित हो रही थी और वहां निर्माण/बेसमेंट संबंधी काम भी चल रहा था। पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज की है और प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई शुरू हुई है। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? क्या उस इमारत को हादसे से पहले किसी अधिकारी ने देखा था? क्या पीजी के रूप में उसके संचालन की अनुमति थी? क्या उसकी संरचनात्मक मजबूती की जांच हुई थी? क्या वहां रहने वाले छात्रों की संख्या, आपातकालीन निकास, अग्नि सुरक्षा और निर्माण कार्यों की निगरानी की गई थी? यदि नहीं, तो यह केवल भवन मालिक की गलती नहीं, बल्कि उ...

जड़ें

Image
जड़ें यूँ तो गुरुग्राम एक मिलेनियम सिटी है, परन्तु आज भी यह कई मायनों में नवीन परिपेक्ष में गांवों का समूह ही लगता है, जहाँ रहने वाले तो पूर्वी दुनिया के ग्रामांचल से हैं, परन्तु इंफ्रास्ट्रक्चर पश्चिमी मानकों का हो गया है। यहाँ चमचमाते फ्लैटों में रहने वाले हरियाणा के भीतरी भागों के लोग हैं, जो विभिन्न कारणों से पलायन कर शहर की दुनिया में आ बसे हैं।ऐसे ही एक छोटे कस्बे पवनपुर में जन्म हुआ जय का। यह कस्बा भले ही नक्शे पर एक बिंदु से अधिक न हो, लेकिन जय के जीवन का हर अध्याय यहीं से शुरू होता था। कस्बे की गालियों में मिट्टी की महक, अमरूद के पेड़ों की छांव, और वह पुराना विशाल मकान — सब कुछ उसकी आत्मा में गहराई तक बसा हुआ हो। कस्बा तो छोटा था, मगर वहाँ के लोग बड़े दिलवाले थे। हर गली, हर मोड़ पर कोई न कोई जानने वाला मिल जाता — “अरे, ये तो चौधरी साहब का पोता है”। उसका मकान कोई आम मकान नहीं था। वकील चौधरी साहब दादा जी ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई से इसे बनवाया था। लाल ईंटों की चौदह इंच की मजबूत दीवारें, शीशम की लकड़ी के ऊंचे दरवाजे, और आंगन में शहतूत का पुराना पेड़ — यह मकान एक इमारत नहीं, बल्...