बच्चे पढ़ने जाते हैं, मरने नहीं

 



बच्चे पढ़ने जाते हैं, मरने नहीं

दिल्ली के सत्यनिकेतन में पांच मंजिला इमारत के ढहने से सात लोगों की मौत ने एक बार फिर देश के सामने वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है—हमारा प्रशासन हादसों के बाद ही क्यों जागता है? यह केवल एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था के ढहने की कहानी है, जिसमें अपने सपनों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली आने वाले छात्र सुरक्षित जीवन की बुनियादी गारंटी तक से वंचित हैं। हादसे के बाद सामने आया कि इमारत में छात्रों के लिए पीजी सुविधा संचालित हो रही थी और वहां निर्माण/बेसमेंट संबंधी काम भी चल रहा था। पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज की है और प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई शुरू हुई है।

लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई?

क्या उस इमारत को हादसे से पहले किसी अधिकारी ने देखा था? क्या पीजी के रूप में उसके संचालन की अनुमति थी? क्या उसकी संरचनात्मक मजबूती की जांच हुई थी? क्या वहां रहने वाले छात्रों की संख्या, आपातकालीन निकास, अग्नि सुरक्षा और निर्माण कार्यों की निगरानी की गई थी? यदि नहीं, तो यह केवल भवन मालिक की गलती नहीं, बल्कि उस निगरानी व्यवस्था की भी विफलता है जो कागजों पर तो मौजूद है, लेकिन जमीन पर दिखाई नहीं देती।

दिल्ली में छात्रों की सुरक्षा का सवाल नया नहीं है। जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर के एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में बारिश का पानी भरने से तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस समय भी सवाल उठे थे कि बेसमेंट में कोचिंग कैसे चल रही थी, सुरक्षा मानकों की जांच क्यों नहीं हुई और जल निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं थी।

लेकिन दो साल बाद भी हम उसी तरह के सवाल पूछ रहे हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस देश में शिक्षा को विकास की सबसे बड़ी सीढ़ी माना जाता है, वहीं शिक्षा के लिए घर से दूर आए बच्चे असुरक्षित इमारतों, अनियंत्रित पीजी और महंगे निजी छात्रावासों के भरोसे जीवन गुजारने को मजबूर हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है। हर वर्ष देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों से हजारों विद्यार्थी यहां पढ़ने आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध कॉलेजों के पास आने वाले विद्यार्थियों की विशाल संख्या की तुलना में छात्रावासों की उपलब्धता बेहद सीमित है। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में विद्यार्थी निजी पीजी और किराये के कमरों पर निर्भर होते हैं। यही वह जगह है जहां शिक्षा और आवास की समस्या धीरे-धीरे छात्र सुरक्षा की समस्या बन जाती है।

सवाल दिल्ली विश्वविद्यालय से भी है—जब विश्वविद्यालय देशभर के विद्यार्थियों को आकर्षित करता है तो पर्याप्त और सुरक्षित छात्रावास उसकी प्राथमिकता क्यों नहीं है? और सवाल सरकार से भी है—देश के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों के आसपास संचालित होने वाले पीजी, हॉस्टल और छात्र आवासों के लिए एक समान, कठोर और अनिवार्य सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती?

और यह संकट केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। राजस्थान का कोटा वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों पर बढ़ते मानसिक दबाव और आत्महत्याओं के कारण चर्चा में रहा है। शोध और रिपोर्टों में वहां छात्र आत्महत्याओं की गंभीर स्थिति सामने आई है।

एक तरफ छात्र इमारतों में सुरक्षित नहीं हैं, दूसरी तरफ वे मानसिक दबाव में सुरक्षित नहीं हैं। तो फिर शिक्षा व्यवस्था आखिर किसकी सुरक्षा कर रही है? हर हादसे के बाद मुआवजे की घोषणा, कुछ अधिकारियों का निलंबन, दोषियों की गिरफ्तारी और जांच समिति गठित करना आसान है। मुश्किल काम है हादसा होने से पहले खतरे को पहचानना। शासन की असली परीक्षा यही है।

सत्य निकेतन में जिन सात परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है, उनके लिए कोई मुआवजा उनके सपनों को वापस नहीं ला सकता। उनके माता-पिता सरकार से केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि जवाब चाहते हैं—हमारा बच्चा पढ़ने दिल्ली आया था, फिर वह सुरक्षित घर वापस क्यों नहीं लौटा? इस सवाल का जवाब किसी एक अधिकारी, किसी एक मकान मालिक या किसी एक विभाग को नहीं, पूरी व्यवस्था को देना होगा।

अब समय है कि सरकार हादसों के बाद जागने की आदत छोड़े और हादसों से पहले जागे। क्योंकि देश के विद्यार्थी केवल आंकड़े नहीं हैं। वे परिवारों की उम्मीद हैं, देश का भविष्य हैं।

- जगदीप सिंह मोर, अनुसंधानकर्ता 

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