हिन्दी : केवल भाषा नहीं, हमारी पहचान का स्वर
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज की स्मृतियों, संस्कारों, संवेदनाओं और सांस्कृतिक पहचान की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति होती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में हिन्दी का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि यह देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों को जोड़ने वाली प्रमुख भाषाओं में से एक है। प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाने वाला हिन्दी दिवस हमें अपनी भाषा के प्रति गौरव और उसके प्रति अपने दायित्व की याद दिलाता है।
हिन्दी की वैश्विक पहुंच का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2026 के एथनोलॉग के आंकड़ों के अनुसार हिन्दी को पहली या दूसरी भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या लगभग 61.1 करोड़ है, इनमें करीब 34.7 करोड़ मातृभाषी और 26.4 करोड़ दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी बोलने वाले शामिल हैं। इस आधार पर हिन्दी दुनिया की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर है। भारत के अतिरिक्त फिजी में हिन्दी को आधिकारिक दर्जा प्राप्त है और मॉरीशस, नेपाल, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, त्रिनिदाद एवं टोबैगो सहित अनेक देशों में हिन्दी बोलने और समझने वाले समुदाय मौजूद हैं।
भारत की जनगणना और विभिन्न भाषाई अध्ययनों में हिन्दी की व्यापकता और भी स्पष्ट दिखाई देती है। हिन्दी केवल हिंदीभाषी राज्यों तक सीमित नहीं है। रोजगार, शिक्षा, व्यापार, सिनेमा, मीडिया और डिजिटल संचार ने इसे देश की सीमाओं से बाहर भी पहुंचाया है। विदेशों में बसे भारतीयों की नई पीढ़ी के लिए हिन्दी अपनी जड़ों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या आंकड़ों में हिन्दी की मजबूती वास्तव में हमारे व्यवहार में भी दिखाई देती है?
यह विडंबना है कि हिन्दी दिवस पर हम हिन्दी के महत्व पर भाषण देते हैं, कविताएं पढ़ते हैं और सोशल मीडिया पर हिन्दी के प्रति प्रेम व्यक्त करते हैं, लेकिन वर्ष के बाकी दिनों में अपनी भाषा के प्रयोग को लेकर अक्सर हीनभावना से ग्रस्त दिखाई देते हैं। अंग्रेजी सीखना और उसका ज्ञान प्राप्त करना निश्चित रूप से आवश्यक है। वैश्विक दुनिया में अंग्रेजी सहित अन्य विदेशी भाषाओं का ज्ञान अवसरों के द्वार खोलता है। लेकिन दूसरी भाषा का ज्ञान अपनी भाषा के प्रति संकोच का कारण नहीं बनना चाहिए।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बहुत पहले ही भाषा और उन्नति के संबंध को रेखांकित करते हुए लिखा था, “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।” यह पंक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। किसी भी समाज की वास्तविक बौद्धिक प्रगति तभी व्यापक हो सकती है, जब ज्ञान केवल एक सीमित भाषाई वर्ग तक न रह जाए। विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, कानून, प्रशासन और उच्च शिक्षा का ज्ञान भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होना ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
हिन्दी की शक्ति उसकी साहित्यिक विरासत में भी दिखाई देती है। कबीर की सादगी, तुलसी की लोकचेतना, सूरदास की भक्ति, प्रेमचंद का यथार्थ, महादेवी वर्मा की संवेदना, रामधारी सिंह दिनकर का ओज और हरिवंश राय बच्चन की जीवन-दृष्टि।हिन्दी साहित्य ने भारतीय समाज के लगभग हर भाव को शब्द दिए हैं।
आज हिन्दी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेजी नहीं, बल्कि स्वयं हिन्दी समाज की भाषाई उदासीनता है। यदि हम चाहते हैं कि हिन्दी वैश्विक भाषा बने, तो उसे केवल भावनाओं की भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, रोजगार, अनुसंधान और तकनीक की भाषा भी बनाना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शिक्षा और इंटरनेट के इस युग में हिन्दी के लिए नई संभावनाएं पैदा हुई हैं। आज हिन्दी में डिजिटल सामग्री, ऑनलाइन शिक्षा, अनुवाद तकनीक और एआई आधारित उपकरण तेजी से विकसित हो रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम इन अवसरों का उपयोग करें।
हिन्दी दिवस इसलिए केवल एक सरकारी आयोजन या विद्यालयी कार्यक्रम का दिन नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए कि हम अपनी भाषा के लिए वास्तव में क्या कर रहे हैं। घर में हिन्दी बोलना, बच्चों को हिन्दी साहित्य से परिचित कराना, हिन्दी में पढ़ना-लिखना, गुणवत्तापूर्ण हिन्दी सामग्री तैयार करना और तकनीकी दुनिया में हिन्दी की उपस्थिति बढ़ाना—ये सभी भाषा सेवा के छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं।
हिन्दी की यात्रा हजारों वर्षों की भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक परंपरा से होकर आधुनिक डिजिटल युग तक पहुंची है। इसे भविष्य की भाषा बनाने की जिम्मेदारी अब हमारी है।
किसी भाषा का सम्मान केवल उसके लिए तालियां बजाने से नहीं, बल्कि उसे जीने, पढ़ने, लिखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने से होता है। हिन्दी में माँ की ममता है, हिन्दी में पापा की सीख, हिन्दी में दादी की कहानी, हिन्दी में बचपन की प्रीत। इस हिन्दी दिवस पर संकल्प यही हो, 'हिन्दी पर गर्व करें, दूसरी भाषाओं का सम्मान करें और ज्ञान की हर भाषा के लिए अपने मन के द्वार खुले रखें'। क्योंकि हिन्दी केवल हमारी भाषा नहीं, 'हमारी स्मृति, हमारी संवेदना और हमारी पहचान की आवाज़ है'।
- जगदीप सिंह मोर, अनुसंधानकर्ता

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