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सी.बी.एस.ई. बोर्ड परीक्षा निकट

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सी.बी.एस.ई. बोर्ड परीक्षा निकट  कोरोना महामारी ने पिछले दो सालों से पूरी दुनिया को अपना ग्रास बनाया हुआ है। यह कहना कोई अतिशियोक्ति नहीं होगा कि सम्पूर्ण जगत में अगर इस महामारी ने किसी को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है, तो वह है शिक्षा का क्षेत्र। पिछले दो वर्षों में स्कूली शिक्षा ने बहुत कुछ खोया है एवं अनेकों नवीन प्रयोग भी किए हैं। जहाँ ऑनलाइन शिक्षा पद्दती अब न्यू नॉर्मल हो चली है वहीं परीक्षा के स्वरूप में भी कई बदलाव किए गए हैं। इसी का उदाहरण है सी.बी.एस.ई. द्वारा 5 जुलाई 2021 को जारी किया सर्कुलर – ‘Acad-51/2021’ के अनुसार निर्धारित की ‘टर्म परीक्षाएँ’। इस साल कक्षा दसवीं एवं बारहवीं कि बोर्ड परीक्षाएँ दो भागों में ली जाएँगी – प्रथम अवधि नवम्बर में तथा द्वितीय अवधि परीक्षा मार्च महीने में।  पाठ्यक्रम को दो बराबर भागों में बाँटा गया, पहले भाग (आधे पाठ्यक्रम) की परीक्षा नवम्बर महीने में ली जाएगी। यह परीक्षा पुराने सब्जेक्टिव बोर्ड प्रश्नपत्र के बिलकुल विपरीत बहु विकल्पीय प्रश्नपत्र के रूप में ली जाएगी। हर विषय का प्रश्नपत्र मल्टिपल चॉईस क्वेस्चन (एम॰ सी॰क्यू॰) आधारित होगा।...

Poem for my Son

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In Remembrance of my Grandfather

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बिन शिक्षक सब सून

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बिन शिक्षक सब सून सम्पूर्ण भारतवर्ष ने कुछ दिन पूर्व शिक्षक दिवस मनाया ,  हर व्यक्ति ने अपने-अपने शिक्षकों को याद किया एवं व्हाट्सएप ,  ट्विटर तथा फेसबुक पर ढेरों मेसेज का ताँता लगा रहा। किंतु हमें अपने आप से एक प्रश्न पूछना चाहिए कि हम सब भारतवासी क्या सच में शिक्षकों को उनका उचित सम्मान देते हैं या ये सिर्फ़ सोशल मीडिया के दिखावे भर रह गया है ?  कोरोना महामारी के इन दो सालों ने हमारे शिक्षा जगत की नींव हिला कर रख दी। जहां एक ओर हर किसी ने बच्चों के भविष्य को ले कर खूब चिन्ताएँ दिखायीं एवं आने वाले समय के आलेखन पर खूब रेखाएँ खींची वहीं किसी ने भी प्रखर स्वर में शिक्षकों के भविष्य को लेकर चिंता नहीं दिखायी ,  ना ही इन दो वर्षों में शिक्षकों की जीविका किस प्रकार चली इस पर किसी का ध्यान गया। बुद्धिजीवियों ने बच्चों के मनोवैज्ञानिक स्तर का मूल्यांकन बखूबी किया पर शिक्षकों के मनोविज्ञान पर हर जगह अपने नेत्र मूँद लिए।   दो दशकों का अनुभव समेटे प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक श्री विकास अत्रि कहते है: ज़रा बीते दो वर्षों पर नज़र डाल कर देखा जाए तो पता चले कि शिक्षक ने अपने आप क...
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  Such a Polarised Nation India – with more than 1.3 billion people constitutes 18 percentage of the world’s population, is a country so diverse that many historians and philosophers have called it a continent in itself. The diversity could be seen in terms of geography, population, beliefs, languages, culture, religious practices, traditions etc. making the list endless. This diversity which was considered as our strongest binding factor is turning up as our strongest dividing factor. Of late, the country is undergoing a strong churning creating polarity within. It is almost impossible to unite such a gargantuan population on any man made postulate or belief such a nationalism. Even ‘God’ has found his various avatars on this land but failed to unite people on single paradigm. With such a diverse country such as ours, the textbook concept of ‘unity in diversity’ seems to be restricted and flawed only to be found in bits and pieces. We are divided on the lines of religion, caste, g...

New Capitalist India 2.0

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  New Capitalist India 2.0   After independence, the bankrupt and shackled GDP of India had the choice to follow Gandhian, Communist or Western Capitalist model of Economics, but we choose to follow Nehruvian Socialist model. The nation needed state support and hence socialistic principles were apt for our underdeveloped economy. Nehru took the much-needed risk to look beyond the primary sector to boost manufacturing, hence accepted  Mahalanobis’ formula to lay the foundation of ‘New India’. It was India 1.0 with core socialistic principles through which the state tried it best to give the ‘ big push ’ to our economy. It was on the  Rosenstein-Rodan  theory of providing an initial thrust to an airplane in order to keep it afloat. Nehru as founding father of Indian Economy lay the foundations of state-owned thermal power plants, steel plants, mega factories, IITs and IIMs.  This concept of ‘ only   government can do ’ clutches on Indian citizens’ mind a...

कोरोना काल में शिक्षा का नया प्रारूप

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  कोरोना काल में शिक्षा का नया प्रारूप  वर्ष 2020 अब अपने अंत की ओर है, और यह वर्ष इतिहास में अपनी अलग पहचान रखेगा। कोरोना काल के पूर्व एवं बाद की दुनिया पूर्णतः बदल चुकी होगी। मार्च में जब लॉकडाउन लगाया गया तब यह किसी ने भी नहीं सोचा था कि समूचे साल को ही कोरोना ग्रस लेगा। अगर यह कहा जाए कि इस सर्वव्यापी महामारी ने सबसे ज़्यादा स्कूली छात्रों की पढ़ाई को प्रभावित किया तो यह कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी। इस वर्ष की समूची स्कूली गतिविधियाँ कोरोना की भेंट चढ़ गई। जब बच्चे अपने पूरे उम्मंग में रहते थे एवं विद्यालयों में पर्व जैसा उत्तसव का माहौल हुआ करता था, वह दिन मानो इतिहास हो चलें हों।  जाने माने मनोविज्ञानिक श्री विकास अत्री बताते हैं, “आज जहाँ विद्यालय बंद पड़े हैं वहीं शिक्षा का नया दौर चुपके से दबे-पाओं आ अपनी जगह बना चुका है। यह है ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली का युग। बीते छह महीनों में यही न्यू नॉर्मल हो चला है”। और अब अलगे सत्र से स्कूल खुल भी जाएँ परंतु यह नवीन शिक्षा पद्दती जाने वाली नहीं हैं। स्कूली शिक्षा का एक बड़ा भाग अब सदा के लिय ऑनलाइन ही हो चला है। शुरूवाती दौर मे...